लफ्ज़
- kewal sethi
- 4 days ago
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लफ्ज़
पता नहीं कैसे, क्यों वह लफ्ज़ अचानक ज़हन में आ गया। एक अर्से से उसे दबा कर रखा गया था और उसे लगभग भुला दिया गया था या यह आभास था कि उसे भुला दिया गया हेै। शुरू शुरू में तो वह लफ्ज़ हर वक्त दिमाग पर छाया रहता था। सोते जगते, आते जाते, वही लफ्ज़ दिमाग में गूॅंजता रहता था। उस को भुलाने के लिये ही उस ने कठोर शरीरिक मेहनत शुरू की। काम में लगे रहें गे तो वह लष़्ज़ दिमाग में कैसे आये गा, यह सोचा। पर ऐसा हुआ नहीं। हाथ अपना काम करते थे और दिमाग अपना। वह बोझ उठाते थे यह भारी वज़न बन कर दिल पर वार करता था।
उस से तंग आ कर उस ने यह रास्ता बदला। कुछ दिमागी कसरत का रास्ता अपनाया। गूढ़ प्रश्न पर विचार करने में मन डूबा रहे गा तो उसे उस लष़्ज़ को याद करने की ज़रूरत नहीं। दिमाग उधर जा ही नहीं पाये गा। इस में वह काफी हद तक वह कामयाब रहा। कठिन से कठिन समास्या को चुन कर उस का समाधान करना, यह उस की दिनचर्या बन गई। और इस के फलस्वरूप उस का जीवन भी सुधरने लगा और वह सफलता के पायदान पर ऊपर चढ़ता गया। यहॉं तक कि विज्ञान के जगत में उस का नाम होने लगा। उस ने एक व्यवसायिक फर्म खोल ली और उस के पास ग्राहकों की कमी न रही। पैसा भी इफरात में आने लगा।
वह भी एक ग्राहक थी। और उस जितनी ही योग्य और काम में दक्ष। दोनों में अच्छी निभने लगी। पहले वह ग्राहक थी और फिर सहकर्मी बन गई। दोनों ने मिल कर सफलता के नये आयाम स्थापित किये।
और एक दिन उस ने उस के सामने आजीवन साथ रहने का प्रस्ताव रखा। पर उस ने साफ इंकार कर दिया। उस की अपनी समस्या थी और वह उस के इंकार की वजह थी।
तभी वह लफ्ज़ फिर उस के दिमाग में गूूंज उठा जिस को भुलाने के लिये उस ने इतना प्रयास किया था। शायद वह लफ्ज़ केवल उस का ही नहीं था, दूसरों का भी हो सकता था, यह उस ने कभी सोचा ही नहीं। उस के कारण ही अच्छी भली गाड़ी अपनी लाईन पर चलती चलती पटरी छोड़ देती है। वह लफ्ज़ उस की सहकर्मी का भीं था -- मजबूरी।
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